महर्षि दयानन्द ने ईश्वर व वेदों का सच्चा स्वरूप बताया : आचार्य हरिओम शास्त्री

 महर्षि दयानन्द ने ईश्वर व वेदों का सच्चा स्वरूप बताया : आचार्य हरिओम शास्त्री

गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में निराला दयानन्द एक सांस्कृतिक देव दूत विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कोरोना काल में 441 वां वेबिनार था।
फरीदाबाद से वैदिक विद्वान आचार्य हरिओम शास्त्री ने कहा कि महर्षि दयानन्द ने ईश्वर की व वेदों की सही व्याख्या की, उसके सही स्वरूप से अवगत करवाया। उन्होंने कहा कि कवि रत्न पंडित प्रकाश चन्द्र ने गाया था कि कोई गिनले दुनिया के जर्रे या गिनले चांद सितारों को, पर कौन गिनेगा दयानन्द के उन अगणित उपकारों को। महर्षि दयानंद सरस्वती वास्तव में निराले महामानव थे जिन्होंने दुनिया को संमार्ग दर्शन के लिए वेदों की राह पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने संसार में ईश्वर के विषय में वेदों और वैदिक आप्त ग्रन्थों में वर्णित स्वरूप को मानने की प्रेरणा दी। वैदिक संस्कृति कहती है कि एकं सद्विप्रा: बहुधा वदन्ति अर्थात् एक ही ईश्वर को विद्वान लोग अनेकानेक गुण, कर्म और स्वभाव के कारण अनेक नामों से जानते हैं। वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश, मित्र, वरुण, हिरण्यगर्भ, वायु, तैजस और जल आदि नामों से जाना जाता है। ईश्वर के एक सौ नामों का वर्णन करते हुए ऋषिवर ने प्रथम ही स्पष्ट कर दिया है कि ईश्वर के विषय में वेदों का आश्रय लेकर ही स्पष्ट और आसानी से जाना जा सकता है। उसके बाद उन्होंने वेदों की स्वयं प्रमाणिकता को सिद्ध करते हुए कहा कि वेद परम प्रमाण हैं, क्योंकि सृष्टि की आदि में वेदों का प्रकाश अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा आदि चार ऋषियों के माध्यम से परमेश्वर ने ही मानव मात्र का कल्याण करने के लिए किया है, अत: किसी भी मानव रचित ग्रंथ से वेदों की प्रमाणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती हैं बल्कि वेदों के आधार पर ही इन बाद के समस्त ग्रन्थों की प्रमाणिकता स्वीकार की जा सकती है अर्थात् जो ग्रन्थ वेद विचाराधारित हैं वे प्रमाणिक और उसके विपरीत सब अप्रमाणिक हैं। अत: सभी को वेदानुकूल आचरण ही करने में भलाई है और उसके विरुद्ध आचरण से विनाश है। उन्होंने इसी प्रकार वेदान्तमत, अवतारवाद, वाममार्ग, चार्वाक दर्शन, ईसाई और इस्लाम मतों का भी खंडन किया है। भारतवर्ष में महाभारत काल के पश्चात् इतनी दृढ़ता से वेदों को सर्वोपरि मानकर अपनी बात कहने और समस्त मनुष्यकृत ग्रन्थों को वेदानुकूल होने पर प्रमाणिक मानने वाले दयानंद ऋषि वास्तव में निराले दयानन्द ही थे। इसी प्रकार राजनीति के शुद्धिकरण और संस्कृति तथा परिवार निर्माण कार्य हेतु वेदाधारित सांस्कृतिक संदेश देने वाले दयानंद सरस्वती वास्तव में निराले ही थे। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कहा कि महर्षि दयानन्द समग्र क्रान्ति के अग्रदूत थे उन्होंने लोगों के सोचने की विचार शक्ति की दिशा ही बदल डाली। मुख्य अतिथि शिक्षा विद जगदीश पाहुजा व अध्यक्ष आर्य नेता लक्ष्मण पाहुजा ने भी महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने ऑनलाइन उपस्थित श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर गायिका प्रवीना ठक्कर, कुसुम भंडारी, कमला हंस, विजय खुल्लर, सुदर्शन चौधरी, शोभा बत्रा, रविन्द्र गुप्ता, कौशल्या अरोरा, सन्तोष सांची, जनक अरोरा, नरेश प्रसाद आर्य ने भजन प्रस्तुत किए।

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